गोगोई की नियुक्तिः मर्यादा-भंग

भारत के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई को सेवा-निवृत्त हुए अभी चार महिने भी नहीं बीते कि उन्हें राज्यसभा में नामजद कर दिया गया। राष्ट्रपति द्वारा नामजद किए जानेवाले 12 लोगों में से वे एक हैं। ऐसा नहीं है कि गोगोई के पहले कोई न्यायाधीश या सर्वोच्च न्यायाधीश सांसद नहीं बने हैं, वे बने हैं लेकिन गोगोई ऐसे पहले सर्वोच्च न्यायाधीश हैं, जो राष्ट्रपति की नामजदगी से राज्यसभा के सदस्य बननेवाले हैं और वह भी सेवा-निवृत्त होने के चार माह के अंदर ही ! इस नियुक्ति से न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधानपालिका- सरकार के इन तीनों अंगों की प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। मेरा सबसे पहले प्रश्न खुद श्री गोगोई से है। वे न्यायपालिका के सर्वोच्च पद पर रहे हैं। वह देश में एक मात्र पद है। उसके मुकाबले कोई दूसरा पद नहीं है। लेकिन राज्यसभा के लगभग ढाई सौ सदस्य हैं। उस सर्वोच्च पद पर बैठने के बाद अब वे ढाई सौ की इस रेवड़ में क्यों शामिल हो रहे हैं ? क्या उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता स्वीकार करके अपने आप को काफी नीचे नहीं उतार लिया है ? और जहां तक सदस्यता मिलने का सवाल है, यह नाक रगड़े बिना, गिड़गिड़ाए बिना, भीख का पल्ला फैलाए बिना किसी को नहीं मिलती। जिन नेताओं को आप जेल की हवा खिलाने का अधिकार रखते थे, उनके आगे नाक रगड़ने में आपको कोई झिझक नहीं रही ? हो सकता है कि आपने राम मंदिर, सबरीमला, राफेल सौदे, सीबीआई और असम की जन-गणना के मामलों में सरकार-समर्थक फैसले शुद्ध गुण-दोष के आधार पर दिए हों लेकिन अब वे सब संदेह के घेरे में आ गए हैं। न्यायाधीशों का आचरण सदा संदेह से भी परे होना चाहिए। वे नेता या उद्योगपति नहीं हैं। जो सरकारें ऐसी नियुक्तियां करती हैं, उन्हें अपनी इज्जत की कोई परवाह नहीं होती। कुर्सी में बैठते ही उनकी खाल दरियाई घोड़ों की तरह मोटी और सुन्न हो जाती है। राज्यसभा के इन 12 नामजदों में ऐसे दर्जनों लोगों को भी उच्च सदन में राष्ट्रपति लोग अक्सर भेजते रहे हैं, जो किसी नगरपालिका में बैठने लायक नहीं होते। उनसे तो गोगोई बेहतर हैं। लेकिन मूल प्रश्न यहां यह है कि जो आदमी सर्वोच्च पद पर बैठकर ‘जी-हुजूरी’ करता रहा हो, वह साधारण सदस्य के रुप में सदन में क्या कोई निष्पक्ष बात कह पाएगा ? गोगोई के पहले भी कई जजों को सरकारों ने राज्यपाल, राजदूत, उप-राष्ट्रपति, सांसद आदि पदों पर बिठाया है लेकिन उनकी सेवा-निवृत्ति के लंबे समय बाद ! हम यह भी न भूले कि गोगोई पर दुराचार का लांछन भी लगा था। यह ठीक है कि गोगोई को शीघ्र नियुक्त करके नरेंद्र मोदी ने यह सिद्ध कर दिया है कि वह एहसान फरामोश नेता (आडवाणीजी और जोशीजी को याद करें) नहीं हैं लेकिन यह सिद्ध करने के लिए संविधान की मर्यादा (शक्तियों का विभाजन) का तो ख्याल रखा जाना चाहिए था।